नये सीएम की चर्चा में सामने आया पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत का नाम

 

देहरादून। विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत के बावजूद उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चुनाव हार जाने से मुख्यमंत्री चयन को लेकर भाजपा हाईकमान के सामने उलझन खड़ी हो गई। यही वज़ह है कि उसे नये मुख्यमंत्री का नाम तय करने में समय लग रहा है। इस बीच दिल्ली में हाईकमान की लगातार बैठकें चल रही हैं। उत्तराखंड के भी कई नवनिर्वाचित विधायक वहां डेरा जमाये हुए हैं। खबर है कि मुख्यमंत्री चयन की इसी आपाधापी के बीच अचानक पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को दिल्ली बुलाया गया है। वहां उनकी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात तय की गई है। इस खबर के बाद सियासी गलियारों में उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में त्रिवेंद्र सिंह रावत की ताजपोशी की कयासबाजी शुरू हो गई है।
गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव भले ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे पर लड़ा हो और बीजेपी को राज्य में प्रचंड जीत मिली हो,लेकिन माना जा रहा है कि इस चुनाव में राज्य की जनता ने भाजपा के पांच साल के कार्यकाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर वोट किया है। उत्तराखंड में बीजेपी को 70 में 47 सीटों पर मिली जीत को इस बात के सुबूत के तौर पर देखा जा रहा है। जहां तक राज्य में बीजेपी की जीत का सवाल है तो इसके पीछे पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल के चार सालों में किए गए कार्यों को भी नकारा नहीं जा सकता है। उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 18 मार्च 2017 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। मुख्यमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल 10 मार्च 2021 को खत्म हुआ। अपने चार साल के कार्यकाल के दौरान उन्होंने विकास के कई कार्य किए। चाहे वह स्वास्थ्य के क्षेत्र में अटल आयुष्मान योजना हो,गरीब जनता को एक रुपये में नल से जल की योजना हो,महिलाओं को पति की पैतृक संपत्ति में सहखातेदार बनाने की योजना हो या फिर मुख्यमंत्री घसियारी कल्याण योजना हो। उनके कार्यकाल में गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का भी एतिहासिक फैसला लिया गया। ठीक-ठाक काम कर रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत को अचानक मुख्यमंत्री पद से हटा देने का हाईकमान का फैसला तब किसी की समझ में नहीं आया था लेकिन राजनीतिक समझ रखने वालों का मानना है कि रावत बीजेपी की अंदरुनी राजनीति का शिकार हुए। बीजेपी में ही कई खेमे उनके खिलाफ हो गए थे, जिन्होंने दिल्ली में केंद्रीय नेतृत्व को उन्हें हटाने के लिए तैयार कर लिया। इसमें दिल्ली में बैठे और स्थानीय मीडिया पर पकड़ रखने वाले मुख्यमंत्री पद के तलबगार उत्तराखंड के एक भाजपा नेता की अहम भूमिका सियासी चर्चाओं का हिस्सा रही। त्रिवेंद्र सिंह रावत, जमीनी स्तर के नेता रहे हैं। उनकी संगठन के भीतर मजबूत पकड़ मानी जाती है। ऐसे में बीजेपी ने उन्हें विधानसभा चुनाव में अहम भूमिका दी और उनके कार्यों को जनता के बीच लेकर गई। इसी का नतीजा रहा कि उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी को 70 में 47 सीटों पर प्रचंड जीत मिली। ऐसे में भाजपा का एक बड़ा तबका त्रिवेंद्र रावत को दिल्ली बुलाये जाने के घटनाक्रम को उन्हें एक बार फिर से उत्तराखंड का मुख्यमंत्री पद सौंपने की तैयारी के संकेत के रूप में देख रहा है। भाजपाई सूत्रों का कहना है कि उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री पिछले दो दिनों से दिल्ली में है। जहां वह कई केंद्रीय नेताओं से मिल रहे हैं। शनिवार को उन्होंने बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा से मुलाकात की और रविवार सुबह वह केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिले। सूत्रों की मानें तो त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बीजेपी अध्यक्ष और गृह मंत्री से मिलकर उत्तराखंड में चल रहे वर्तमान परिदृश्य को लेकर चर्चा की है। इधर, उनके समर्थकों का मानना है कि भाजपा का
केंद्रीय नेतृत्व एक बार फिर उत्तराखंड की बागडोर त्रिवेंद्र सिंह रावत के सौंपने की तैयारी कर रहा है। सच्चाई करता है, यह तो आज़ शाम या कल सुबह तक सबके सामने आ ही जाएगी।

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