168वींं जयंती: दबे कुचले समाज की आवाज थे डाॅ भीमराव अंबेडकर

 

अनंत आकाश

चौदह अप्रैल 1891को मिथ आर्मी कैन्टोमेन्ट में जन्मे भारत के संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर तत्कालीन समाज के सर्वाधिक कमजोर परिवार से संबंध रखते थे जो कि सदियों से सामंती व्यवस्था की जकड़न के साथ ही भारी भेदभाव झेलने के लिए विवश था। उन दिनों दलितों, पिछड़ों तथा महिलाओं को सांमती व्यवस्था में काफी कुछ प्रतिबन्धों को झेलना पड़ता था। उनके खुलेतौर पर सार्वजनिक स्थानों पर आने-जाने पर भारी प्रतिबन्ध था। उनका जीवन रूढिवादी समाज की इच्छा तथा दया पर निर्भर था। यह सब कुछ अंबेडकर एवं उनके परिवार के साथ भी पीढ़ी दर पीढ़ी होता चला आ रहा था। दलित परिवार से होने के नाते सामंती व्यवस्था की कुप्रथाओं एवं शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार उन्हें पल – पल सहना पड़ा। शुरुआत उनके स्कूली दिनों से ही हुई। भेदभाव एवं सामाजिक प्रतिबन्धों एवं कुरीतियों से जूझते हुए उन्होंने अपनी पढा़ई जारी रखी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अंबेडकर शिक्षा में भी अव्वल थे। भारी कष्टों को सहते हुए 1917 में उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय से डाॅक्टरेट की उपाधि ग्रहण कर सदियों से चली आ रही परम्परा तोड़ी तथा लंबी छलांग लगाकर साबित कर दिया कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन हों, उनसे लड़ा भी जा सकता है और जीता भी जा सकता है।
वे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ दलितों, महिलाओं तथा समाज के दबे कुचले वर्ग के जागरण के लिए लिखते भी रहे तथा आंदोलन भी करते रहे। हिंदू धर्म में व्याप्त विषमताओं के खिलाफ उन्होंने काफी कुछ लिखा तथा हिंदू धर्मान्धता के चलते उन्होंने बौद्ध धर्म तक को अपना लिया। उन्होंने 1956 में बौद्ध धर्म को लेकर की गयी विपरीत टिप्पणी पर सावरकर को बुरी तरह लताड़ा और उन्हें समाज को विभाजित करने वाला संकीर्ण इंसान कहा। डाॅ अंबेडकर कई मायनों में गांधी जी से भी असहमति रखते थे। वे आधुनिक भारत के संविधान निर्माता थे , जिनकी दूरदर्शिता के परिणामस्वरूप दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं,आदिवासियों तथा समाज के कमजोर तबकों को शिक्षा, नौकरियों में आरक्षण आदि का अधिकार मिला जिस कारण आज उनके जीवन स्तर में सुधार देखने को मिल रहा है। संविधान में हरेक व्यक्ति के लिए मौलिक अधिकार का प्रावधान भी उन्हीं की देन है। डाॅ अंबेडकर शिक्षा को परिवर्तन का हथियार मानते थे, इसलिए वे शिक्षा पर जोर देते थे तथा दलित समाज को अपने आगे बढ़ने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करते थे। वे इस आजादी से खुश नहीं थे क्योंकि उनकी नज़र में ये आजादी अधूरी थी, जिसमें बुनियादी नीतियों में ज्यादा बदलाव नहीं था। संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की जयंती पर हम सभी को उन ताकतों के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लेना चाहिए, जो साम्प्रदायिक, जातीय और आर्थिक आधार पर देश की जनता के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं तथा देश को आज ऐसी जगह खड़ा करके रख दिया जहाँ आम जनता अपने को असहाय महसूस कर रही है। बाबा साहेब ने अपने जीवन मेंं विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का संकल्प नहीं छोड़ा, इसलिए देश की जनता को कारपोरेटपरस्त, साम्प्रदायिक, फूटपरस्त नीतियों वाली तथा राजनैतिक रूप से अधिनायकवादी प्रवृति की सत्ता के खिलाफ एकजुटता के साथ अपने संघर्ष को तेज करना चाहिए। हम सबको बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के समता मूलक समाज के स्वप्न को साकार करना होगा, यही सही मायनों में उनके प्रति श्रद्धांजलि होगी।

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