आकलन: जब एक सोच विचारधारा बन जाती है

 

संदीप सिंह गुसाईं
देहरादून। वैसे तो केदारनाथ विधानसभा के निवर्तमान विधायक मनोज रावत से मेरा नाता एक पत्रकार के वरिष्ठ साथी के रूप में रहा है। जिस समय हम साधना न्यूज़,ईटीवी और फिर जी मीडिया में कार्य करते थे तो मनोज भाई हमेशा पहाड़ के जमीन से जुड़े मुद्दों को उठाते थे। इन्वेस्टीगेशन जर्नलिज्म की सबसे बड़ी खबरें उन्होंने ही उत्तरखंड से तहलका,आउटलुक,गुलेल जैसी प्रतिष्ठित मैगजीन में लिखीं। 2013 कि आपदा में चपल से उन्होंने केदारनाथ और बद्रीनाथ विधानसभा के कई इलाकों की जमीनी रिपोर्टिंग हमारे साथ की।वक्त बदला और उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर मीडिया से अलविदा कह दिया। उसके बाद भी उनकी सोच अपने पहाड़ के प्रति नहीं बदली।पूरे पौड़ी,चमोली,रुद्रप्रयाग और टिहरी से एकमात्र कांग्रेस के विधायक के रूप में चुनकर आये जबकि 2017 में पूरी मोदी लहर चल रही थी। फिलहाल एक विपक्ष के विधायक को जो विधानसभा में अपना काम करना चाहिए उसे बखूबी निभाया।2018 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने बुग्यालों में नाईट स्टे पर रोक लगा दी। उत्तराखंड के पक्ष और विपक्ष के 70 विधायकों में केवल मनोज रावत ही थे जिन्होंने इस निर्णय के खिलाफ सरकार को ऑर्डिनेंस या सुप्रीम कोर्ट जाने की मांग की। या यूँ कहें कि इस मुद्दे को समझे और लागातर उठाते रहे। उत्तराखंड एक पर्यटन प्रदेश है। पहाड़ की रीढ़ यही पर्यटन है। चारधाम के अलावा हर साल यहाँ बड़ी संख्या में ट्रेकर्स लंबे ट्रैक पर जाते हैं और मखमली बुग्यालों में रात्रि विश्राम करते हैं लेकिन उसी पर रोक के कारण पर्यटन कारोबार धीरे धीरे घटने लगा।

उन्होंने केवल पर्यटन ही नहीं बल्कि कई नई सोच पैदा की, जिसमें चौमासी के केदारनाथ, कयाकिंग,माउंटेन बाइकिंग और तुंगनाथ से तुंगनाथ ट्रैक इसके अलावा उन्होंने माल्या मुल्क की पहचान दोखा को खुद पहनकर नई पहचान दिलाई। केदारनाथ घाटी में पर्यटन की इतनी संभावनाएं हैं कि ना केवल रुद्रप्रयाग बल्कि अन्य जिलों की आजीविका भी इससे बेहतर हो सकती है।

मांगल गीतों बढ़ावा देने के लिए उनकी पहल और प्रयास को कौन भूल सकता है। मैं खुद उन मांगल मेलों के आयोजनों का गवाह रहा और मुझे उस परंपरा को करीब से जानने का मौका मिला।कालीमठ की विनीता देवी सारी गाँव की गुड्डी देवी और रामेश्वरी देवी जी ना जाने कितनी छुपी महिला प्रतिभाओं को उन्होंने मंच दिया। क्या पौड़ी के किसी विधायक ने ऐसा किया? क्या उत्तरकाशी,पिथौरागढ़,अल्मोड़ा,बागेश्वर और चमोली में लुप्त हो रहे पारंपरिक लोकगीतों को किसी ने संजोने का कार्य किया तो जवाब मिलेगा नहीं, क्योंकि ऐसी सोच ही नहीं है।

अब उनकी हर गॉंव में लाइब्रेरी की सोच को केदारनाथ ही नहीं बल्कि अन्य जिलों में भी मुद्दा बनाया जा रहा है। खुद 5 साल तक उच्च शिक्षा मंत्री रहे डॉ धन सिंह रावत ने जीतने के बाद हर गॉंव में लाइब्रेरी खोलने का वादा किया है। मतलब साफ है कि शिक्षा ही समाज को बदल सकती है।आज हर आदमी किताबों से दूर जा रहा है, ऐसे में मुझे लगता है कि मनोज रावत की हर गॉंव में लाइब्रेरी की मुहिम 70 विधानसभाओं में होनी चाहिए। हर विधायक को अपनी संस्कृति को बचाने के प्रयास का ब्लूप्रिंट बताना चाहिए। हर विधायक को अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने में सबसे ज्यादा धनराशि खर्च करनी चाहिए।भले ही गांवों में खोली गई लाइब्रेरी में ज्यादा लोग ना पढ़ें लेकिन अगर एक बालक इन किताबों को पढ़कर आईएएस और पीसीएस बन जाये तो किताब की विचारधारा की जीत होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *