संघ कार्यकर्ता की मुखबिरी के चलते शहीद होना पड़ा था आजाद को

 

पुलिस से बचने के लिए महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद प्रायः सार्वजनिक स्थलों पर
रुकते थे। 27 फरवरी 1931 की अलस्सुबह वह इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क पहुंचे थे। रात में जागते रहने की वजह से घने पेड़ के नीचे बैठते ही
उन्हें नींद आ गई। पार्क में सुबह संघ की शाखा लगती थी। शाखा में एक युवक था वीरभद्र तिवारी, जो कभी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का सदस्य रह चुका था। वह आजाद को पहचानता था। उसने पुलिस को खबर कर दी। पुलिस की एक सशस्त्र टुकड़ी ने आनन फानन में अल्फ्रेड पार्क को घेर लिया लेकिन उनके पास जाने की किसी में हिम्मत नहीं थी। पुलिस ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। जवाब में अपनी माउजर पिस्टल से आजाद ने अपने सटीक निशाने से कई पुलिस वालों को घायल कर दिया था। आजाद को भी कई गोलियां लग चुकीं थीं। जब उनके पास आखिरी गोली बची तो उन्होंने जीते जी पुलिस के हाथ लगने के बजाय अपनी कनपटी में गोली मार कर शहादत वरण कर ली और इस तरह एक महान क्रांतिकारी का अंत हुआ।
( पुलिस के गुप्तचर अधिकारी धर्मेन्द्र गौड़ की डायरी से साभार संपादित )

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