Wednesday, July 15, 2026
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उत्तराखंड

पुलिस पेश नहीं कर पाई ठोस सबूत, मानसिक दिव्यांग युवती से गैंगरेप मामले में दोनों आरोपी बरी

 

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में मानसिक रूप से दिव्यांग युवती के साथ हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म और अपहरण के मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने वर्ष 2019 के दो अलग-अलग क्रिमिनल अपीलों पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सामूहिक दुष्कर्म की सजा को पलट दिया है। अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और फॉरेंसिक नमूनों की सुरक्षा में बरती गई लापरवाही को आरोपियों को बरी करने का मुख्य आधार बनाया है।

मामले के अनुसार 7 मार्च 2018 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा की रहने वाली एक युवती अचानक लापता हो गई थी। पीड़िता के भाई ने अगले दिन पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई, जिसमें बताया गया कि युवती मानसिक रूप से दिव्यांग है और बोलने में भी सक्षम नहीं है। युवती 8 मार्च की रात को एक पेट्रोल पंप के पास डरी-सहमी हुई मिली, जिसके बाद उसे घर लाया गया। वहां उसकी मां ने उसके कपड़ों पर खून के धब्बे और शरीर पर चोट के निशान देखे, जिसके बाद युवती ने इशारों में दो लोगों द्वारा यौन उत्पीड़न की बात कही।

अदालत ने अपने फैसले में विशेष रूप से फॉरेंसिक साक्ष्यों की श्चेन ऑफ कस्टडीश् (कब्जे की श्रृंखला) पर सवाल उठाए। आरोपी के मामले में अभियोजन पक्ष ने उसके कपड़ों पर मिले डीएनए को मुख्य सबूत के तौर पर पेश किया था। हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस यह साबित करने में विफल रही कि बरामद किए गए कपड़ों को लैब भेजने तक पूरी तरह सुरक्षित रखा गया था। अदालत ने कहा कि जब तक बरामदगी की ईमानदारी और सुरक्षा का दस्तावेजी प्रमाण न हो, वैज्ञानिक रिपोर्ट को निर्णायक नहीं माना जा सकता।

जांच के दौरान पीड़िता के कपड़ों या शरीर से लिए गए किसी भी नमूने में उसका डीएनए नहीं पाया गया। डीएनए प्रोफाइलिंग ने स्पष्ट रूप से उसे यौन हमले के कृत्य से बाहर रखा। खंडपीठ ने रेखांकित किया कि केवल साथ देखे जाने या संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता, विशेषकर तब जब वैज्ञानिक साक्ष्य उसके पक्ष में हों।

हालांकि, अदालत ने दूसरे आरोपी को अपहरण की धारा 363 के तहत दोषी माना है। अभियोजन पक्ष ने सीसीटीवी फुटेज पेश किया था जिसमें मूल चंद्र को युवती का हाथ पकड़कर ले जाते देखा गया था। कोर्ट ने माना कि भले ही मेडिकल रिपोर्ट में युवती की आयु 18 से 20 वर्ष के बीच पाई गई, लेकिन उसकी मानसिक स्थिति एक अबोध व्यक्ति जैसी थी। ऐसे में उसे उसके कानूनी अभिभावकों की मर्जी के बिना ले जाना कानूनी रूप से अपहरण की श्रेणी में आता है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पीड़िता की बौद्धिक अक्षमता के कारण इस मामले में सहमति का कोई अर्थ नहीं था। कानून के अनुसार, जो व्यक्ति अपनी मानसिक स्थिति के कारण परिणाम समझने में असमर्थ है, उसके साथ किया गया ऐसा कृत्य गंभीर है। परंतु, चूंकि मूल चंद्र के खिलाफ दुष्कर्म या सामूहिक दुष्कर्म (धारा 376-क्) का कोई ठोस सबूत नहीं मिला, इसलिए उसे इन धाराओं से मुक्त कर दिया गया।

सजा के मामले में कोर्ट ने मानवीय और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखा। मूल चंद्र को अपहरण के लिए निचली अदालत ने 4 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत को अवगत कराया गया कि वह पहले ही 4 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है। इस तथ्य को देखते हुए अदालत ने आदेश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा कर दिया जाए।

अदालत ने पहले आरोपी की अपील को पूरी तरह स्वीकार करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया और तत्काल रिहाई के आदेश दिए।

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