‘शहीदे आजम’ भगत सिंह को 91 वें शहादत दिवस पर शत-शत नमन एवं श्रद्धांजलि
अनंत आकाश
हिन्दुस्तान के क्रांतिकारी आंदोलन के महानायक शहीदे आजम भगतसिंह का आज़ 23 मार्च 22 को 91वां शहादत दिवस है। इसी दिन उनके साथ सुखदेव तथा राजगुरु को भी फांसी दी गई थी। 28 सितंबर 1907 को लायलपुर पंजाब में सरदार किशन सिंह के घर जन्मे भगतसिंह बहुत ही कम उम्र में अंग्रेजों के जुल्मोसितम को करीब से देख चुके थे तथा महसूस भी कर चुके थे। उनकी प्राथमिक शिक्षा गांव में हुई तथा मैट्रिक का दाखिला नेशनल स्कूल लाहौर में लिया। भगतसिंह का परिवार आजादी के आन्दोलन की मुख्यधारा से जुड़ा हुआ था तथा उनके परिवार का कुर्बानी का इतिहास था। यही कारण है कि जब उन्हें फांसी की सजा हुई, उनका परिवार आखिरी बार लाहौर केन्द्रीय कारागार में उनसे मिलने गया तो उनकी दादी ने कहा- ‘भगत सिंह तूने हमारा नाम ऊंचा कर दिया।’ भगतसिंह जब छोटे थे तो बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर के आदेश पर एकत्रित निहत्थी जनता पर गोलीबारी की गई थी, जिसमें सैकड़ों की संख्या में लोग मारे गये तथा हताहत हुए। उनमें बड़ी संख्या में बूढ़े ,बच्चे व महिलाएं शामिल थे। इस घटना से नन्हे भगतसिंह के मन पर भारी आघात लगा। उन दिनों देश के युवाओं की तरह ही भगतसिंह पर महात्मा गांधी जी का काफी प्रभाव था। वे गांधी जी को अपना आदर्श मानने लगे थे ।
20 नवम्बर 1920 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गांघी जी का अहिंसा तथा असहयोग आन्दोलन का प्रस्ताव पारित हुआ । महात्मा गांधी जी के आह्वान पर असहयोग आन्दोलन की शुरुआत हुई, जिसमें सरकार को टैक्स न देना, सरकारी नौकरियों से इस्तीफा,स्कूल कालेजों का बहिष्कार, विदेशी कपड़ों की होली जलाने जैसे कार्यक्रम शामिल थे। गांधी जी के आह्वान पर पूरा देश अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर था। हजारों की संख्या में छात्र अपनी पढा़ई छोड़कर गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में कूद चुके थे। लोगों को लग रहा था कि अब जल्दी ही आजादी मिल जाएगी, किन्तु चोराचोरा काण्ड में शान्तिपूर्ण ढंग से विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस की गोलीबारी से प्रतिक्रिया स्वरूप उग्र भीड़ ने पुलिस चौकी जला दी,जिसमें 14 पुलिसकर्मियों की जलने से मौत हुई । गांधी जी ने अचानक असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया, जिसके कारण लोगों में भारी निराशा हुई। युवाओं का गांधी जी से मोहभंग होने लगा। वे विकल्प की तलाश में जुट गये। इस बीच लाहौर ,कानपुर ,दिल्ली कलकत्ता तथा देश के अन्य हिस्सों में क्रान्तिकारी गतिविधियों में तेजी आयी जिनसे युवा तेजी से जुड़ने लगे। 1924 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एशोसिएशन का गठन हुआ, जिसका मुख्य मकसद युवाओं को एकजुट कर उन्हें आजादी के आन्दोलन की क्रान्तिकारी धारा से जोड़कर अपनी गतिविधियों में तेजी लाना था। शुरुआती दौर में क्रान्तिकारियों का मकसद सरकारी तन्त्र को जगह जगह नुकसान पंहुचाने तथा अपनी गतिविधियों को संचालित के लिए धन एकत्रित करना था। 9 अगस्त 1925 काकोरी में हुई ट्रेन लूट के पीछे भी यही मकसद था, किन्तु धीरे धीरे अनुभव ने उन्हें आन्दोलन का वैचारिक आधार बढ़ाने पर जोर दिया और लाहौर में 1925 को नौजवान भारत सभा गठन तथा भगतसिंह और अन्य साथियों के जुड़ने से क्रान्तिकारी आन्दोलन की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव आया। 9 व 10 सितंबर 1928 से एच आर ए अब एच आर एस ए के नाम से जाना जाने लगा। उन दिनों युवाओं पर सोवियत क्रान्ति का भी काफी प्रभाव था। इसलिए वे भगतसिंह के नेतृत्व में इसी दिशा की ओर अपने देश में बदलाव चाहते थे तथा वे पूर्ण स्वराज्य के पक्षधर थे। दूसरी तरफ गांधी जी के नेतृत्व में डोमिनियन स्टेट की मांग यानी आधा राज, जिसका नियंत्रण अन्ततः अंग्रेजी हुकूमत के पास ही रहने देने की बात थी। इस तरह दो विचारधाराओं का टकराव चल रहा था। 8 अप्रैल 1928 को पब्लिक सैफ्टी बिलों के खिलाफ भगतसिंह व बटुकेश्वर दत्त द्वारा दिल्ली असेम्बली में बम फेंका गया । वे एसेम्बली बमकाण्ड के माध्यम से अवाम के सामने क्रान्तिकारियों के उद्देश्यों को रखना चाहते थे। उसके बाद दोनों ने गिरफ्तारी दी। कोर्ट में जब भी क्रान्तिकारी पेश किये जाते तो कोर्ट के माध्यम से आवाम तक अपनी बात रखते। इस प्रकार अब क्रान्तिकारी आन्दोलन वैचारिक परिपक्वता से भरा हुआ था। उनका मानना था कि कौमी एकता के माध्यम से अंग्रेजों से लड़ा जा सकता है, क्योंकि हमारे देश में उस समय भी और आज भी ऐसी ताकतें हैं जिन्हें कौमी एकता नापसंद है। इसके लिए वे अंग्रेजों के लिए मुखबिरी भी कर रहे थे तथा पेंशन भी ले रहे थे। 17 नवम्बर सन् 1929 को साईमन कमीशन के बहिष्कार का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपतराय पर पुलिस के बर्बर हमले तथा उनकी मौत एवं सरकार की दमनात्मक कार्यवाही के बीच क्रान्तिकारियों ने लालाजी की मौत का बदला लेने की योजना बनाई गई। उसमें 17 दिसम्बर 1929 को हत्या का जिम्मेदार स्कोट्स को मारने की योजना थी, किन्तु मारा गया जलियांवाला बाग का हथियारा साण्डर्स ! असेंबली बमकांड के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने एक के बाद एक क्रान्तिकारियों की गिरफ्तारी की तथा उन पर सभी केस दर्ज किये ताकि वे जेल से बाहर ही न आ सकें। इस बीच तमाम मुकदमों पर सुनवाई शुरू हुई । जेल में कैदियों के साथ हो रहे भेदभाव तथा जनता से जुड़ी अन्य सभी मांगों को लेकर भगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों के द्वारा लम्बी हड़ताल की गई। अन्त में खुशी खुशी देश के लिए शहादत देना एक ऐसी मिसाल है जो युगों युगों तक अन्याय व अत्याचार के खिलाफ लड़ने वाले आवाम को दिशा देती रहेगी। आज फिर से हमारे समाज में सौहार्दपूर्ण माहौल बनाने के संघर्ष को तेज करने की आवश्यकता तभी हम साझी शहादत ,साझी बिरासत की परम्परा की रक्षा कर सकते हैं। यही शहीदों को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।
(लेखक सीपीएम से जुड़े हैं। प्रस्तुत लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं)

